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How to become a Karmayogi? Chapter 29

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प्रिय साधकों ओम नमो नारायण हिमालय गुरुकुल पाठशाला पर आपका स्वागत है। कैसे बने कर्म योगी की श्रंखला में आज हम अध्याय 29 आपके सामने लेकर के उपस्थित हैं। अध्याय 29 में स्वामी जी ने जो विषय तय किया है वो भगवत गीता का एक सूक्त वाक्य है। युद्धस चरा। तो चलिए तो चलिए शुरू करते हैं इस अध्याय इस अध्याय को। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कर्म योग का शिक्षा दिया है जिसमें उन्होंने कहा है कि कर्म करते हुए योग में स्थित होकर कर्म बंधन से मुक्त हो जाना है। योग आत्मा और मन को आत्मा और मन के बीच सामंजस्य स्थापित करता है। योग मन और आत्मा को जोड़ने का साधन है। शांति, प्रसन्नता, आनंद और मुस्कान के साथ कर्म करने का एक अनोखा तरीका है। कर्म योग। हृदय में प्रभु का ध्यान और और शरीर से दिन भर संसार के छोटे बड़े सभी तरह की सेवा यही मन वाणी और शरीर का कर्म है । इस पर पुस्तक का आखिरी कर्म सूत्र लिखते हुए भगवान लिखते हुए स्वामी जी भगवान श्री कृष्ण की गीता का एक श्लोक कोट करते हैं। कहते हैं लिखते हैं सर् करण सन अध्यात्म चेतसा निराम युद्धस मुझ अंतर्यामी परमात्मा में सारे कर्म को अर्पण करके आशा रहित ममता रहित संताप रहित और आलस्य रहित होकर युद्ध करो मैं अर्थात परमेश्वर में सर्वाण कर्माण सन्यस सब कर्म छोड़कर अध्यात्म चेतसा मतलब मैं सब कर्म कर्म ईश्वर के लिए सेवक की तरह कर रहा हूं । इस बुद्धि से सब कर्म मुझ में अर्पण

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