योगः कर्मषु कौशलम || What is Yoga? || कैसे बने कर्मयोगी || मौनी बाबा #yoga #dharm
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अध्याय 18 अध्याय 18 का विषय स्वामी जी ने जो लिखा तय किया है लिखा है योग कर्मसु कौशलम चलिए शुरू करते हैं कर्म योग जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का साधन है । इस अध्याय में हम दैनिक जीवन में योग को शामिल करने का करने पर चर्चा करेंगे । सूत्र योगा कर्मसु कौशलम योग ही कर्म कर्म में कुशलता है अर्थात कर्म में लगे हुए पुरुष का जो ईश्वर समर्पित बुद्धि से उत्पन्न हुआ सिद्धि असिद्धि विषयक समत्व भाव है वही कुशलता है जो अपने को कर्ता समझता है कि मैं करता हूं मैं कर्म कर रहा हूं ऐसे व्यक्ति के लिए भगवान कहते हैं कि अहंकार मूढ़ आत्मा कर्ता इति मन्यते अर्थात अहंकार से मोहित हुआ अज्ञानी मैं करता हूं ऐसे मानता है तत्व तुम ना अहम करोमि इति मन्यते लेकिन ज्ञानी तत्ववेत्या जो ज्ञानी तत्ववेत्ता होता है वह मैं नहीं करता ऐसा मानता है। कर्म योग एक ऐसा कौशल है जो मनुष्य को अहंकार से मुक्त करके कर्तित्व बोध से अकर्तित्व बोध में प्रतिष्ठित करता है। अर्थात अहम ना कर्ता अहम ना भोगता अहम आत्मा आत्मा निर्विकार होने के कारण आत्मा में कर्तित्व भोक्तित्व आदि का भाव नहीं है। अहंकार से विमूढ़ विकारवान मनुष्य अपने को कर्ता समझते हैं। आत्म तत्व बड़ा कठिन है। सहज ही समझ में आने वाला नहीं है। कर्म योग कर्म करने का एक ऐसा कौशल है जो मनुष्य को ज्ञान का प्रकाश प्रदान करता है। मनुष्य अज्ञानता वश इस नश्वर शरीर को अपना वास्तविक स्वरूप समझता है । मन की अशुद्धता के कारण अपने आत्म स्वरूप को जान नहीं पाता । अपना अपना स्वरूप को जानने के लिए मन को शुद्ध करना पड़ेगा और शुद्ध करना आवश्यक है। मन ए । मन एक निर्मल दर्पण की भांति है जिसमें हम अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानते हैं । इतना ही नहीं शुद्ध मन वह है जो मनुष्य को अनंत शांति और प्रसन्नता प्रदान करता है