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Himalay के शीतल कुटी हुआ दिव्य संतो का आगमन।

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हरि ओम नमो नारायण। यह स्वामी शिवंद जी का भी तपस्थली है जो कि विगत 15 वर्ष से इसी शीतलकोटी के परिसर में यहां पर तपस्या कर रहे हैं अपनी। नमो नारायण स्वामी जी और आज ये परम सौभाग्य आपके भी दर्शन का यहां पे मौका मिला है। स्वामी जी काफी चर्चा चल रही थी हमारी सत्संग पे और पिछली बार आप ध्यान योग के बारे में बहुत अच्छा बता रहे थे जब आपसे मुलाकात हुई थी। कुछ फिर उसी बात को कुछ कंटिन्यू आगे करिए। अभी तो आपने साहब को भी सुना होगा। जी स्वामी जी बहुत प्रिय साहब को जी हां कबीर साहब के जो आ रखे हैं संत लोग और भोप्रिया साहब ने अच्छा भजन का भी वो बताया । भजन द्वारा साहब की वाणीियों को बताया । तो इसमें तो सारे कबीर पंथ में मत वाले लोग होते हैं, माने लोग होते हैं । उनकी पर स्वामी जी वो भक्ति का योग है और आपका मार्ग ध्यान का है । ध्यान और भक्ति दोनों ही है। एक ही है, एक ही है, एक ही है । जी कबीर दास जी ने क्या कहा ? उनकी भाषा थोड़ी रफ है । वो मानता हूं मैं और बिल्कुल अपने गांव की भाषा में स्पष्ट कर दिया । लेकिन बड़ा मार्मिक है उनका भी कथन । जैसे हम लोग कहते हैं कि निर्विचारता की ओर चले जाए । जी तो निर्विचार जहां सारे विचार समाप्त हो जाए तो वहां फिर बचता क्या है ? और विचार अलग-अलग हो सकते हैं । अनेक प्रकार के विचार हो सकते हैं । लेकिन शांति तो एक ही प्रकार की होती है । जी। जैसे डॉक्टर के पास 100 मरीज जाते हैं तो कई प्रकार की बीमारियां हो सकती है लेकिन स्वस्थ जब हो जाता है तो स्वस्थ तो एक ही होता है। एक ही प्रकार का होता है। उसी प्रकार निर्विचारता वो एक ही प्रकार की होती है। चाहे कोई भी उसमें चला गया।

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